
जह वाणिया य पणियं लाभत्थं विक्किणंति लोभेण ।
भोगाण पणिद भूदो सणिदाणो होइ तह धम्मो॥1252॥
ज्यों व्यापारी लोभवशात् लाभ के लिये बेचता माल ।
त्यों निदान करनेवाला मुनि धर्म बेचता है भोगार्थ॥1252॥
अन्वयार्थ : जैसे वणिक लाभ के लिए किराना बेचता है, उसीप्रकार निदान सहित चारित्रादि धर्म धारण करना, वह भोगों के लोभ से ही अंगीकार करना है, परमार्थ के लिए नहीं ।
सदासुखदासजी