
सपरिग्गहस्स अब्बंचरिणो अविरदस्स से मणसा ।
काएण सीलवहणं होदि हु णडसमणरूवं व॥1253॥
मन से वह सग्रन्थ अव्रती अब्रह्मचारि यदि करे निदान ।
ब्रह्मचर्य पाले काया से जैसे नट का वेश श्रमण॥1253॥
अन्वयार्थ : जो अभ्यन्तर वेद से उत्पन्न राग भाव वही परिग्रह है । उससे सहित है, मन से कुशील का वांछक, अत: अब्रह्मचारी है तथा इन्द्रिय सहित सुख का वांछक है, इसलिए अव्रती है । जिसका अभ्यन्तर आत्मा जो ऐसा है और काया से शील धारण करता है, मुनिव्रत धारण करता है, परिग्रह धारण नहीं करता है, नग्न रहता है, पीछी-कमण्डल धारण करता है, कायोत्सर्ग करता है, दुर्धर तप करता है, वह नट श्रमण रूप है । जैसे स्वांग धरने वाला नट अनेक स्वांग धरता है, तैसे ही कोई जैन साधु का स्वांग धरता है; परन्तु स्वांग धरने से वह साधु नहीं हो जाता । अन्तरंग में वीतरागता के बिना अभिमान भोग-विषयों का वांछक मुनि के भी नट-समान स्वांग ही है ।
सदासुखदासजी