
रोगं कंखेज्ज जहा पडियार सुहस्स कारणे कोई ।
तह अण्णेसदि दुक्खं सणिदाणो भोगतण्हाए॥1254॥
औषधि सेवन-सुख की वांछा से रोगी रहना चाहे ।
त्यों निदान कर्त्ता भोगों की तृष्णा से दुःख को चाहे॥1254॥
अन्वयार्थ : जैसे कोई नीरोगी होकर भी इलाज सुख के लिए रोग की इच्छा करता है, तैसे ही भोगों की तृष्णा से निदान सहित पुरुष आगामी काल में बहुत दुख की इच्छा करता है/देखता है ।
सदासुखदासजी