खंदेणए आसणत्थं वहेज्ज गरुगं सिलं जहा कोई ।
तह भोगत्थं होदि दु संजमवहणं णिदाणेण॥1255॥
ज्यों आसन के लिए शिला भारी कन्धे पर ले घूमे ।
त्यों निदान से भोग हेतु दुर्धर संयम का भार धरे॥1255॥
अन्वयार्थ : जैसे कोई पुरुष अपने आसन के लिए बहुत भारी पाषाण की शिला को अपने कंधे पर लिये-लिये फिरे कि 'मुझे जहाँ बैठना हो, वहाँ शिला बिछाकर बैठ जाऊँगा'; तैसे ही भोगों के लिए निदान करके संयम धारण करना हुआ ।

  सदासुखदासजी