
भोगोव भोगसोक्खं जं जं दुक्खं च भोगणासम्मि ।
एदेसु भोगणासे जातं दुक्खं पडिविसिठ्ठं॥1256॥
भोगोपभोग से होनेवाला सुख अरु भोगनाश का दुःख ।
दोनों में है अधिक तीव्र जो होता भोगनाश से दुःख॥1256॥
अन्वयार्थ : संसार में भोगोपभोग की प्राप्ति से जितने-जितने सुख होते हैं, उसे भोगोपभोग के विनाश से उतने-उतने ही दुख होते हैं । उनमें भोगों की प्राप्ति के सुख से भोगों के विनाश से उत्पन्न दु:ख बहुत अधिक हैं ।
सदासुखदासजी