
देहे छुहादिमहिदे चले य सत्तस्स होज्ज कह सोक्खं ।
दुक्खस्स य पडियारो रहस्सणं चेव सोक्खंखु॥1257॥
नश्वर देह क्षुधादिग्रस्त इसमें रति से क्या सुख होता?
दुःख का हो प्रतिकार तथा दुख कम करने को सुख माना॥1257॥
अन्वयार्थ : क्षुधा-तृषा आदि की बाधा से पीडित और चलायमान विनाशीक यह देह, उसमें प्राणी को सुख कैसे होगा? नहीं होगा । ये इन्द्रिय जनित सुख हैं, वे क्षुधा-तृषा, काम रागादि जनित दुख को थोडे समय के लिए कम करते हैं, बाद में बहुत वेदना को बढाते हैं ।
सदासुखदासजी