
जह कोडिल्ल अग्गिं तप्पंतो णेव उवसम लभदि ।
तह भोगे भुंजंतो खणं वि णो उवसमं लभदि॥1258॥
ज्यों कोढ़ी यदि तपे अग्नि में किन्तु न पाये शान्ति कभी ।
वैसे भोग भोगने पर भी शान्ति न मिलती क्षण भर भी॥1258॥
अन्वयार्थ : जैसे कोढी पुरुष अग्नि से तप्तायमान होता हुआ भी उपशान्तता/शान्ति को प्राप्त नहीं होता, रुधिर चंूता/रिसता है, इस कारण और अधिकाधिक अग्नि से सेंकने की वांछा होती है । तैसे ही संसारी जीव भोगों को भोगता हुआ भी क्षणमात्र के लिए भी भोगों की चाह रूप दाह से शान्त नहीं होता । ज्यों-ज्यों भोगता है, त्यों-त्यों अधिकाधिक तृष्णा बढती जाती है ।
सदासुखदासजी