
सोक्खं अणपेक्खित्ता बाधादि दुक्खमणुगंपि जह पुरिसं ।
तह अणपेक्खिय दुक्खं णत्थि सुहं णाम लोगम्मि॥1259॥
ज्यों सुख से विहीन किंचित् भी दुःख जन को देता है कष्ट ।
वैसे इन्द्रिय-सुख भी जग में दुःख वेदन के बिना न हो॥1259॥
अन्वयार्थ : जैसे अणुमात्र दु:ख भी पुरुष को सुख की अपेक्षा न रख कर बाधा ही करता है, तैसे ही लोक में दु:ख की अपेक्षा न करके कोई सुख है ही नहीं ।
सदासुखदासजी