+ भावार्थ - दु:ख तो सुख बिना ही होता है और सुख, दु:ख बिना है ही नहीं । क्षुधा- -
कच्छुं कंडुयमाणो सुहाभिमाणं करेदि जह दुक्खे ।
दुक्खे सुहाभिमाणं मेहुण आदीहिं कुणदि तहा॥1260॥
जैसे खाज खुजाने वाला दुःख में भी सुख ही माने ।
मैथुन आदि विषयरत प्राणी दुःख में भी सुख ही माने॥1260॥
अन्वयार्थ : जैसे खाज रोग युक्त पुरुष खाज को खुजलाने के दु:ख में सुख मानता है, तैसे ही कामी पुरुष मैथुनादि कामचेष्टा के दु:ख में सुख मानता है ।

  सदासुखदासजी