घोसादकीं य जह किमि खंतो मधुरित्ति मण्णदि वराओ ।
तह दुक्खं वेदंतो मण्णइ सुक्खं जणो कामी॥1261॥
जैसे कृमि विष्टा भक्षण करके भी मधुर स्वाद माने ।
त्यों बेचारे कामीजन भी दुःख भोगें पर सुख माने॥1261॥
अन्वयार्थ : जैसे कृमि/लट कडवी तुरई तथा विषफल का भक्षण करके जहर ही को मधुर मानती है । तैसे ही दीन ऐसा कामी व्यक्ति प्रत्यक्ष में शरीरादि दु:खों को अनुभवता हुआ भी काम की वेदना से पीडित हुआ सुख मानता है ।

  सदासुखदासजी