सुठ्ठु वि मग्गिज्जंतो कत्थ वि कयलीए णत्थि जह सारो ।
तह णत्थि सुहं मग्गिज्जंतो भोगेसु अप्पं पि॥1262॥
भली भाँति खोजें पर केल वृक्ष में होता सार नहीं ।
वैसे कितना भी भोगें पर भोग कभी सुखकार नहीं॥1262॥
अन्वयार्थ : जैसे बहुत अच्छी तरह से देखने पर भी केले के स्तम्भ में कहीं भी सार नहीं मिलता, तैसे ही भोगों में अल्प भी सुख नहीं है ।

  सदासुखदासजी