ण लहदि जह लेहंतो सुक्खल्लय मठ्ठियं रसं सुणहो ।
से सगतालुगरुहिरं लेहंतो मण्णए सुक्खं॥1263॥
जैसे कुत्ता सूखी हड्डी चूसे किन्तु न रस पावे ।
कटे तालु से बहे रक्त के रस में ही वह सुख माने॥1263॥

  सदासुखदासजी