महिलादि भोगसेवी ण लहदि किंचिवि सुहं तथा पुरिसो ।
सो मण्णदे वराओ सगकाय परिस्समं सुक्खं॥1264॥
महिलादिक के विषय भोग में किंचित् भी नहिं सुख पावे ।
अपने शारीरिक श्रम में ही मूढ़ विचारा सुख माने॥1264॥
अन्वयार्थ : जैसे श्वान को सूखी हड्डियों को चबाने से रक्त प्राप्त नहीं होता है, उन हड्डियों की कोर/किनार लगने से स्वयं के तालु फट जाने के कारण रक्त निकलता है, उसे हड्डियों में से निकला मानकर भ्रम से सुख मानता है । तैसे ही स्त्री के भोगों का सेवन करने वाले कामी पुरुष को किंचित् मात्र भी सुख नहीं मिलता । वह काम की पीडा से भिखारी हुआ दीन होकर अपनी काया के परिश्रम को ही सुख मानता है ।

  सदासुखदासजी