तह अप्पं भोगसुहं जह धावंतस्स अहिदवेगस्स ।
गिम्हे दण्हातत्तस्स होज्ज छायासुहं अप्पं॥1265॥
ग्रीष्म ऋतु में तीव्र वेग युत पुरुष, वृक्ष की छाया में ।
थोड़ा-सा सुख पाता वैसे अल्प मात्र सुख भोगों में॥1265॥
अन्वयार्थ : जैसे अति उष्ण ग्रीष्मकाल में तीव्र वेग से दौडने वाला कोई पुरुष मार्ग में थोडे समय के लिए वृक्ष की छाया में दौडता हुआ अति अल्प काल के लिए सुख का अनुभव करता है । तैसे ही कर्म के कारण महादुखरूप संसार में परिभ्रमण करने वाले पुरुष के भोगों का सुख भी बहुत कम समय के लिए दिखाई देता है ।

  सदासुखदासजी