
अहवा अप्पं आसाससुहं सरिदाए दप्पियंतस्स ।
भूमिच्छिक्कंगुठ्टस्स उब्भमाणस्स होदि सोत्तेण॥1266॥
डूब रहा नर कोई नदी में अंगुष्ठ भूमि से छू जाये ।
आश्वासन सुख अल्प मिले त्यों भोगों में भी अल्प मिले॥1266॥
अन्वयार्थ : जैसे नदी के मध्य बहुत जोर के प्रवाह में बहते और डूबते हुए पुरुष का भूमि से अंगुष्ठ का स्पर्श होने का अति अल्प काल आश्वासनरूप सुख है कि मैं थम गया, बच गया, अब मैं प्रवाह से निकल जाऊँगा । ऐसा एक पलक मात्र भूमि से अंगुष्ठ के स्पर्शन का आश्वासन है, पुन: बहकर मरण को प्राप्त होता है, तैसे ही संसारी जीव कर्मजनित त्रास से बहता हुआ कोई किंचित् मात्र विषय, धन-परिवार इत्यादि का सम्बन्ध मिलने से आश्वासन मानता है । बाद में संसार-प्रवाह में बहता हुआ निगोद में चला जाता है ।
सदासुखदासजी