दीसइ जलं व मयतण्हिया हु जह वणमयस्स तिसिदस्स ।
भोगा सुहं व दीसंति तह य रागेण तिसियस्स॥1267॥
तीव्र तृषा से व्याकुल वन मृग मृग-तृष्णा में जल देखे ।
राग तृषा से प्यासा नर भी विषय-भोग में सुख देखे॥1267॥
अन्वयार्थ : जैसे वन में तृषा से पीडित वन के मृग को दूर पडी हुई रेत जल-समान दिखती है, वह उसे जल जानकर दौडता है, परन्तु वहाँ जल नहीं है । फिर आगे या अन्य दिशा में मृगमरीचिका दिखती है तो उस ओर दौडता है, परन्तु वहाँ भी जल नहीं दिखता, तब फिर आगे या दूसरी दिशा में मृगतृष्णा नामक रेत दिखी तो उस तरफ दौडता है, लेकिन वहाँ भी जल नहीं दिखता, तब दूसरी ओर दौडता है । ऐसे दौडते-दौडते तृष्णा (तृषा) के कारण प्राण गँवा देता है । तैसे ही तीव्र राग से तृष्णा को प्राप्त हुआ संसारी पुरुष भी भोगों में सुख मानता है, सुख है नहीं! ऐसे भोगों की अतितृष्णा से मरण को प्राप्त होकर नरक-निगोद में चला जाता है ।

  सदासुखदासजी