वग्घो सुखेज्ज मदयं अवगासेऊण जह मसाणम्मि ।
तह कुणिमदेहसंफंसणेण अबुहा सुखायंति॥1268॥
ज्यों मसान में मुर्दा खाकर व्याघ्र सुखी निज को माने ।
त्यों अज्ञानी दुर्गन्धित तन-आलिंगन में हर्षित हों॥1268॥
अन्वयार्थ : जैसे श्मशानभूमि में मृतक का आस्वादन कर/खाकर व्याघ्र, कंूकरा, श्वान, ल्याली सुखी होते हैं, वैसे ही स्त्रियों के अशुचि अंग का स्पर्शन करके विषयांध अज्ञानी सुखी होते हैं ।

  सदासुखदासजी