जावंति केइ भोगा पत्त सव्वे अणंतखुत्ता ते ।
को णाम तत्थ भोगेसु विंभओ लद्धविजडेसु॥1269॥
जावंेत किइ भागिा त्ति सव्वि अणंतखुत्ता ति ।
काि णाम तत्थ भागिसिु विंभआि लद्धेवजडसिु॥1269॥
अन्वयार्थ : हे आत्मन्! जितने भी भोग हैं, वे सभी तुमने अनंत बार भोग लिये तथा अनंतबार भोगकर छोड दिये, उनकी प्राप्ति होने में क्या विस्मय/आश्चर्य है?

  सदासुखदासजी