जह जह भुंजइ भोगे तह तह भोगेसु वड्ढदे तण्हा ।
अग्गीव इंधणाइं तण्हं दीविंति से भोगा॥1270॥
ज्यों-ज्यों भोग भोगता त्यों-त्यों भोगों में तृष्णा बढ़ती ।
तृष्णा होती है प्रदीप्त ज्यों ईंधन से अग्नि बढ़ती॥1270॥
अन्वयार्थ : संसारी जीव ज्यों-ज्यों भोगों को भोगता है, त्यों-त्यांे भोगों की तृष्णा बढती जाती है । जैसे ईंधन अग्नि को बढाता है ।

  सदासुखदासजी