
जीवस्स णत्थि तित्ती चिरंपि भोगहिं भुज्जमाणेहिं ।
तित्तीए विणा चित्तं उव्वूरं उव्वुदं होइ॥1271॥
दीर्घकाल तक भोगें इन भोगों को किन्तु न तृप्ति मिले ।
तृप्ति बिना चित आकुल-व्याकुलरूप तथा उद्विग्न रहे॥1271॥
अन्वयार्थ : इस जीव को चिरकाल से भोगने में आये हुए जो भोग, उनसे भी तृप्ति नहीं हुई और तृप्ति बिना चित्त उद्वेगरूप एवं उखडा हुआ रहता है ।
सदासुखदासजी