
जह इंधणोहिं अग्गी जह व समुद्दो णदीसहस्सेहिं ।
तह जीवा ण हु सक्का तिप्पेदुं कामभोगेहिं॥1272॥
तृप्त न हो ईंधन से अग्नि समुद्र हजारों नदियों से ।
तृप्ति नहीं होती जीवों की वैसे ही इन भोगों से॥1272॥
अन्वयार्थ : जैसे ईंधन से अग्नि तृप्त नहीं होती, हजारों-लाखों नदियों के प्रवाह पडने से समुद्र तृप्त नहीं होता; तैसे ही काम-भोगों से संसारी जीव भी तृप्त नहीं होता, तृप्ति पाने में समर्थ नहीं होता ।
सदासुखदासजी