
देविंदचक्कवट्टी य वासुदेवा य भोगभूमीया ।
भोगेहिं ण तिप्पंति हु तिप्पदि भोगेसु किह अण्णी॥1273॥
इन्द्र चक्रवर्ती नारायण भोगभूमि के जीव सभी ।
तृप्त नहीं होते भोगों से अन्य लहें कैसे तृप्ति॥1273॥
अन्वयार्थ : देवों के इन्द्र, चक्रवर्ती, नारायण, प्रतिनारायण तथा भोगभूमियों ने सागरों तथा पल्यों की, पूर्व की आयुपर्यन्त अप्रमाण जगत के सारभूत भोग भोगे, उनसे भी वे तृप्त नहीं हुए तो अन्य संसारियों के थोडे-से भोगों को अल्पकाल भोगने में उन्हें कैसे तृप्ति होगी!
सदासुखदासजी