
संपत्तिविवत्तीसु य अज्ज्णरक्खणपरिग्गहादीसु ।
भोगत्थं होदि णरो उद्धुयचित्तो य घण्णो य॥1274॥
धन हो अथवा नहीं किन्तु अर्जन रक्षण अरु संग्रह में ।
उसे भोगने हेतु मनुज का चित्त सदा उद्विग्न रहे॥1274॥
अन्वयार्थ : संपदा में, आपदा में, धन उपार्जन करने में, रक्षा करने में, संचय करने में तथा आदि शब्द से खर्च करने में, देने में, भोगने में, सर्व लोक के परिग्रह में, अपने परिग्रह में तथा पर के परिग्रह में संसारी जीव का चित्त भोगों के लिये चलायमान होता है तथा जब आपदा/आपत्ति आ जाये, तब भोगों के वियोग से परिणाम अत्यन्त क्लेशित होते हैं, निरन्तर उत्कंठा बनी रहती है और जब संपदा आवे, तब भोगों में अत्यन्त लीन हो जाता है, अचेत हो जाता है; इसलिए जिसे भोगों की इच्छा है, उसके समान जगत में कोई क्लेशित नहीं है ।
सदासुखदासजी