
उद्धुयमणस्स ण सुहं सुहेण य विणा कुदो हवदि पीदो ।
पीदीए विणा ण रदी उद्धुयचित्तस्स घण्णस्स॥1275॥
व्याकुल चित्त कभी न सुखी हो सुख के बिन कैसे प्रीति ।
उत्कण्ठा से ग्रस्त चित्त को प्रीति बिना होती न रति॥1275॥
अन्वयार्थ : जिसका चित्त चंचल है, उसे सुख नहीं है और सुख बिना प्रीति कैसे हो? तथा प्रीति बिना रति/आसक्ति नहीं होती । जिसको उत्कंठारूप डाकिनी ने ग्रहण/ग्रस्त कर लिया है, उसके परिणाम कहीं भी और किसी भी समय में स्थिरता को प्राप्त नहीं होते ।
सदासुखदासजी