जो पुण इच्छदि रमिदुं अज्झप्पसुहम्मि णिव्वुदिकरम्मि ।
कुणदि रदिं उवसंतो अज्झप्पसमा हु णत्थि रदी॥1276॥
यदि तुम रमना चाहो तो आध्यात्मिक सुख में हो उपशान्त ।
इसमें ही रतिवन्त बनो, नहिं अन्य रति अध्यात्म समान॥1276॥
अन्वयार्थ : जो वीतरागी निर्वाण सुख में रत है, उस निर्वाण को देने वाले अध्यात्मसुख में मन्दकषायी होकर (तुम) रति करो । इस अध्यात्मसुख समान रति/सुख अन्यत्र नहीं है ।

  सदासुखदासजी