अप्पायत्ता अज्झपरदी भोगरमणं परायत्तं ।
भोगरदीए चइदो होदि ण अज्झप्परमणेण॥1277॥
आत्म-रति स्वाधीन रहे अरु भोग-रति पर के आधीन ।
भोग-रति से च्युत हो जाता आत्म-रति है बाधा हीन॥1277॥
अन्वयार्थ : अध्यात्म रति तो स्वाधीन है । इसमें परद्रव्यों की अपेक्षा नहीं है और भोगों में रमणता पराधीन है, क्योंकि परद्रव्यों के आलम्बन बिना भोग नहीं होते । भोग रति से तो छूटते हैं और अध्यात्मरति से नहीं चिगते हैं; क्योंकि भोगों में अनेक विघ्न आते हैं और अध्यात्मरति विघ्न का नाश करनेवाली है ।

  सदासुखदासजी