
भोगरदीए णासो णियदो विग्घा य होंति अदिवहुगा ।
अज्झप्परदीए सुभाविदाए णासो ण विग्घो वा॥1278॥
भोग-रति का नाश सुनिश्चित होते विघ्न अनेक प्रकार ।
किन्तु सुभावित आत्म-रति अविनाशी है निर्विघ्न स्वभाव॥1278॥
अन्वयार्थ : भोगों में विघ्न निश्चय से आते ही हैं । अच्छी तरह अनुभव किया गया जो अध्यात्म सुख उसमें विघ्न नहीं आते और उसका नाश भी नहीं होता ।
सदासुखदासजी