
दुक्खं उप्पादिंता पुरिसा पुरिसस्स होदि जदि सत्तू ।
अदिदुक्खं कदमाणा भोगा सत्तू किह ण हुंती॥1279॥
यदि पुरुषों को दुःख देनेवाला शत्रु कहलाता है ।
तो अति दुःखदायक इन्द्रिय-सुख क्यों न शत्रु कहलाता है॥1279॥
अन्वयार्थ : जो जगत में जीवों को दु:ख उत्पन्न करनेवाले हैं, वे शत्रु माने जाते हैं तो अति दु:ख को उत्पन्न करने वाले भोग, शत्रु कैसे नहीं होंगे!
सदासुखदासजी