इधरं परलोगे वा सत्तू मित्तत्तणं पुणमुवेंति ।
इधरं परलोगे वा सदाइ दुखावहा भोगा॥1280॥
इसी जन्म या अगले भव में शत्रु मित्र हो जाते हैं ।
किन्तु भोग तो दोनों भव में दुःखदायक ही होते हैं॥1280॥
अन्वयार्थ : जो शत्रु हैं, वे तो इस लोक में या परलोक में मित्रपने को प्राप्त हो भी जाते हैं, परन्तु भोग तो इस लोक में तथा परलोक में सदा ही दु:ख देने वाले ही होते हैं ।

  सदासुखदासजी