
एगम्मि चेव देहे करेज्ज दुक्खं ण वा करेज्ज अरी ।
भोगासे पुण दुक्खं करिंत भवकोडिकोडीसु॥1281॥
शत्रु एक ही भव में दुःख देते हैं अथवा नहिं देते ।
किन्तु भोग तो कोटि-कोटि जन्मों में दुखदायक होते॥1281॥
अन्वयार्थ : जो वैरी हैं, वे तो एक ही देह/भव में दु:ख देते हैं अथवा न भी दें, परन्तु ये भोग इस जीव को कोडाकोडी भवों में, असंख्यात, अनन्त भवों में दु:ख देते हैं । इसलिए भोगों से उत्पन्न जो दोष, उन्हें जानकर भोगों के लिये निदान मत करो ।
सदासुखदासजी