मधुमेव पिच्छदि जहा तडिओलंबो ण पिच्छदि पपादं ।
तह सणिदाणो भोगे पिच्छदि ण हु दीहसंसारं॥1282॥
यथा कूप में मधु बिन्दु ही देखे नर, नहिं आत्म-पतन ।
त्यों निदान कर्त्ता भोगों को देखे, नहिं संसार भ्रमण॥1282॥
अन्वयार्थ : जैसे कूप के तटभाग में लटकता (स्थित) कोई अज्ञानी मधुमक्खियों के छत्ते से गिरते हुए मधु को ही देखता/स्वाद लेता है, परन्तु कूप में गिर जाऊँगा, इसप्रकार अपने पतन को नहीं देखता । तैसे ही निदान करनेवाला जीव भोगों को ही देखता है, लेकिन अपना पतन होगा, दीर्घकाल तक संसार में परिभ्रमण होगा, उसे नहीं देखता है ।

  सदासुखदासजी