जालस्स जहा अंते रमंति मच्छा भयं अयाणंता ।
तह संगादिसु जीवा रमंति संसारमगणंता॥1283॥
यथा जाल में क्रीड़ा करते मत्स्य, हुए भय से अनजान ।
त्यों परिग्रह में हर्षित होते मोही भव-भय से अनजान॥1283॥
अन्वयार्थ : जैसे मत्स्य (मीन) मरण के त्रास को नहीं देखते हुए धीवर के जाल में क्रीडा करता है । वैसे ही यह संसारी जीव अपना संसार में परिभ्रमण होना नहीं देखता/गिनता हुआ परिग्रहादि में ही रमता है ।

  सदासुखदासजी