
दुक्खेण देवमाणुसभोगे लद्धूण चावि परिडिदो ।
णियदिमदीदि कुजोणीं जीवो सघरं पउत्थो वा॥1284॥
कष्ट साध्य नर-सुर भोगों को भोग, वहाँ से च्युत हो कर ।
जाए नर निश्चित कुयोनि में जैेसे पथिक आए निज-घर॥1284॥
अन्वयार्थ : यह जीव बडे कष्ट से देवों और मनुष्यों के भोगों को प्राप्त करके भी पर्याय छूटने पर मरण करके नियम से पुन: कुयोनि - नरक, तिर्यंच गति में चला जाता है । जैसे प्रवासी अपने घर को आ जाता है ।
सदासुखदासजी