जीवस्स कुजोणिगदस्स तस्स दुक्खाणि वेदयंतस्स ।
किं ते करंति भोगा मदोव वेज्जो मरंतस्स॥1285॥
दुःख भोगते हुए कुयोनि में जन्मे इन जीवों का ।
क्या कर सकते भोग यथा मृत-वैद्य मरण के सन्मुख का॥1285॥
अन्वयार्थ : कुयोनि को प्राप्त हुए और कुयोनियों में दु:खों को भोगते हुए इस जीव को इन्द्रियों के भोग क्या सहायता करेंगे? कुयोनि में जाने वाले को और दु:ख भोगने वाले को इन्द्रियों के भोग शरण सहायी नहीं होते । जैसे मृतक वैद्य मरते हुए जीव की रक्षा-चिकित्सा नहीं करते ।

  सदासुखदासजी