
जह सुत्तवद्धसउणो दूरंपि गदो पुणो व एदि तहिं ।
तह संसारमदीदि हु दूरंपि गदो णिदाणगदो॥1286॥
सूत्र-बद्ध पक्षी सुदूर जाकर भी वहीं लौट आता ।
त्यों निदानगत भी सुरगति पा पुनः कुयोनि में आता॥1286॥
अन्वयार्थ : जैसे लम्बी डोरी से बँधा हुआ पक्षी उडकर बहुत दूर चले जाने पर पुन: अपने स्थान पर आ जाता है, उडकर चले जाने से क्या होता है? पैर तो सूत की डोरी से बँधे/ नियंत्रित हैं, वह भाग नहीं सकेगा । तैसे ही निदान करनेवाला बहुत दूर स्वर्गादिक में महर्द्धिक देवपने को प्राप्त करके भी, संसार में ही परिभ्रमण करेगा, देवलोक में जाकर भी निदान के प्रभाव से एकेंद्रिय तिर्यंचों में, पंचेंद्रिय तिर्यंचों में तथा मनुष्यों में आकर पाप संचय आदि करके नरक-निगोदादिक में दीर्घकाल तक परिभ्रमण करेगा ।
सदासुखदासजी