पं-सदासुखदासजी
दाऊण जहा अत्थं रोधणमुक्को सुहं घरे वसइ ।
पत्ते समये य पुणो रुम्भइ तह चेव धारणियो॥1287॥
धन देकर छूटा बन्दीगृह से निज-घर में ऋणी रहे ।
ऋण की अवधि पूर्ण होने पर फिर से कारागृह जाये॥1287॥
सदासुखदासजी