
तह सासण्णं किच्चा किलेसमुक्कं सुहं वसइ सग्गे ।
संसारमेव गच्छइ तत्तो य चुदो णिदाण कदो॥1288॥
वैसे ही मुनिपद धारणकर रहे स्वर्ग में क्लेश विहीन ।
किन्तु निदानी च्युत होकर फिर भ्रमण करे इस जग में ही॥1288॥
अन्वयार्थ : जैसे कर्जदार व्यक्ति कुछ धन देकर बन्धन मुक्त हो कुछ समय के लिए अपने घर में सुखपूर्वक रहता है और कर्ज लौैैटाने का करार पूरा होने के समय में जिसका धन वृद्धि/ ब्याज सहित लिया हो, वह पुन: बन्दीगृह में डाल देता है; तैसे ही जो साधुपना धारण करके भी निदान करता है, वह कुछ समय के लिए स्वर्ग में क्लेश रहित सुख पूर्वक रहता है और आयु पूर्ण होते ही स्वर्ग से चय कर संसार को ही प्राप्त होता है ।
सदासुखदासजी