
संभूदो वि णिदाणेण देवसुक्खं च चक्कहरसुक्खं ।
पत्तो तत्तो य चुदो उववण्णो णिरयवासम्मि॥1289॥
कर निदान संभूत मुनि देवेन्द्र चक्रवर्ती होकर ।
सुख भोगे फिर मृत्यु प्राप्त कर तिर्यक् में उत्पन्न हुआ॥1289॥
अन्वयार्थ : संभूत नामक मुनि निदान करके देवों के सुख भोग कर, वहाँ से संभूत नामक मुनि निदान करके देवों के सुख भोग कर, वहाँ से चयकर चक्रवर्ती हुआ, उसके सुख भोगकर मरण करके नरक को प्राप्त हुआ, यहाँ ऐसा जानना - मुनिपने में तथा देशव्रतिपने में मन्दकषाय के तथा तपश्चरण के प्रभाव से स्वर्गलोक में उत्पन्न होने वाला तथा अहमिंद्र लोक में उत्पन्न होने योग्य शुभकर्म बाँधा हो, पश्चात् निदान करे तो नीच भवनत्रिकादि अधमदेवों में उत्पन्न होता है । जिसके पुण्य अधिक हो और अल्प पुण्य के फल का निदान करे तो वह मनुष्य मरकर हीन पुण्य वाले देवों में उत्पन्न होता है । यदि अधिक पुण्यवान देवों या मनुष्यों में उत्पन्न होना चाहे तो नहीं उपजता है । निदान से हीन तो मिलता है, अधिक नहीं मिलता । जैसे किसी के पास बहुत मूल्यवान वस्तु हो और वह अल्पधन/कम कीमत में बेचे तो अल्प धन मिल जाता है, लेकिन अल्प मोल की वस्तु बहुत धन में बेचना चाहे तो बहुत धन नहीं मिलता । जो मुनि-श्रावक का धर्म है, वह साक्षात् स्वर्ग-मोक्ष का देने वाला है, ऐसे धर्म को धारण करके भोगों का निदान करके बिगाडता है, वह एक कोडी में चिंतामणि रत्न को बेचता है अथवा ईंधन के लिये कल्पवृक्ष को काटता है । भोगों के लिये निदान करने के समान जगत में और कोई अनर्थ नहीं है । नारायणादि भी निदान के कारण ही परिभ्रमण करते हैं ।
सदासुखदासजी