
णच्चा दुरंतमद्धु यमत्ताणमतिप्पयं अविस्सायं ।
भोगसुहं तो तम्हा विरदो मोक्खे मदिं कुज्जा॥1290॥
दुखफल अध्रुव तथा अरक्षक तृप्ति रहित भोगे बहुबार ।
इन्द्रिय सुख से हो विरक्त शिवसुख में चित्त लगाओ सार॥1290॥
अन्वयार्थ : कैसे हैं भोग? जिनका फल दु:खरूप है, अस्थिर हैं, रक्षा करने में समर्थ नहीं हैं, अतृप्ति के करने वाले हैं, विश्राम रहित हैं, अन्तसहित हैं । ऐसे भोगों को जानकर ज्ञानीजन भोगों के सुख से विरक्त होकर मोक्ष के में अपनी बुद्धि को लगाते हैं ।
सदासुखदासजी