अणिदाणेय मुणिवरो दंसणणणाणचरणं विसोधेदि ।
तो सुद्धणाण चरणो तवसा कम्मक्खयं कुणइ॥1291॥
निदान रहित मुनि सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित्र विशुद्ध करें ।
शुद्ध ज्ञान चारित अरु तप से सकल कर्ममल नष्ट करें॥1291॥
अन्वयार्थ : जो मुनिवर निदान नहीं करते, उनके दर्शन-ज्ञान-चारित्र शुद्ध होते हैं और जिनके दर्शन-ज्ञान-चारित्र शुद्ध होते हैं, वे ध्यान नामक तप से कर्मों का क्षय करते हैं ।

  सदासुखदासजी