
इच्चेव मेद मविचिंतयदो होज्ज हु णिदाणकरणमदी ।
इच्चेवं पस्संतो ण हु होदि णिदाणकरणमदी॥1292॥
इसप्रकार जो नहीं विचारें वस्तु-तत्त्व, वे करें निदान ।
जो विचार करते उनकी मति में उत्पन्न न कभी निदान॥1292॥
अन्वयार्थ : ऐसे पूर्वोक्त प्रकार निदान के दोषों को नहीं विचारने वाले पुरुष के निदान करने की बुद्धि होती है । जो निदान को विषसमान अनंत दु:खों को देने वाले भावों को जानता है, वह निदान करने में अपनी बुद्धि नहीं लगाता है ।
सदासुखदासजी