+ गाथाओं में कहते हैं - -
मायासल्लस्सालोयणाधियारम्मि वण्णिदा दोसा ।
मिच्छत्तसल्लदोसा सय पुव्वमुववणिणया सव्वे॥1293॥
माया शल्य दोष वर्णन कर आए आलोचन अधिकार ।
मिथ्यात्व शल्य के दोष सभी कह दिये पूर्व में जानो सार॥1293॥
अन्वयार्थ : मायाशल्य से उत्पन्न हुए दोषों का पूर्व में आलोचना नामक अधिकार में वर्णन कर आये हैं और मिथ्याशल्य के सभी दोषों का भी पूर्व में वर्णन कर आये है । इसलिए माया- मिथ्या-निदान तीन प्रकार की शल्यों को हृदय में से निकालना ।

  सदासुखदासजी