+ कर आये हैं और मिथ्याशल्य के सभी दोषों का भी पूर्व में वर्णन कर आये है । इसलिए माया- -
पब्भट्ठवोधिलाभा मायासल्लेण असि पूदिमुही ।
दासी सागरदत्तस्स पुप्फदंता हु विरदा वि॥1294॥
सागरदत्त सेठ के घर में पूतिमुखी दासी हुई ।
माया से आर्यिका पुष्पदन्ता यद्यपि आर्यिका थी॥1294॥
अन्वयार्थ : पुष्पदंता नामक आर्यिका शल्य के कारण रत्नत्रय के लाभ से भ्रष्ट होकर, मायाचार के पाप से सागरदत्त नामक वणिक के यहाँ महादुर्गंधरूप देह को धरने वाली पूतिमुखी नाम की दासी हुई । देखो! कहाँ स्वर्गलोक को देने वाला आर्यिका का व्रत और कहाँ वणिक के घर में दुर्गंधी दासी होना । मायाशल्य महान अनर्थ करने वाला है ।

  सदासुखदासजी