
मिच्छत्तसल्लदोसा पियधम्मो साधुवच्छलो संतो ।
बहुदुक्खे संसारे सुचिरं पडिहिंडिओ मरिची॥1295॥
मुनियों से वात्सल्य भाव अरु धर्मप्रेम रखनेवाला ।
मारीचि मिथ्यात्व दोष से दीर्घ काल संसार भ्रमा॥1295॥
अन्वयार्थ : अतिवल्लभ है धर्म जिसको और साधु पुरुषों में प्रीतियुक्त होने पर भी मरीची एक मिथ्याशल्य के दोष से अति दु:खरूप संसार में बहुत/असंख्यात काल पर्यंत परिभ्रमण करता रहा ।
सदासुखदासजी