+ इस प्रकार मिथ्याशल्य का वर्णन किया । अब ऐसे साधु समूह निर्वाणपुरी में प्रवेश करते हैं, यह कहते हैं- -
इय पव्वज्जामंडि समिदि बइल्लं तिगुलिदिढचक्कं ।
रादिय भोयण उद्धं सम्मत्तक्खं सणाणधुरं॥1296॥
क्षपक साधुरूपी व्यापारी दीक्षावाहन पर संघ साथ ।
सिद्धिपुरी की ओर करे वह शिव-सुख निधि हेतु प्रस्थान॥1296॥

  सदासुखदासजी