
तो भावणादियंतं रक्खदि तं साधुसत्थमाउत्तं ।
इंदिय चोरेहिंतो कसाय बहुसावदेहिंतो॥1299॥
संघ-पति संघ की रक्षा करते हैं भावनादि द्वारा ।
इन्द्रिय चोरों से एवं कषाय रूप हिंसक पशु से॥1299॥
अन्वयार्थ : ऐसी जिन-दीक्षारूप गाडी में चढकर साधुसमूह सहित जो निर्वाणपुरी की ओर गमन करते हैं, वे साधु-वणिक संसाररूपी वन से पार हो जाते हैं । कैसी है दीक्षा रूप गाडी? जिसके समितिरूप तो बैल हैं, तीन गुप्तिरूप दृढ पहिये/चक्र हैं, रात्रिभोजन का त्याग वही गाडी का ऊर्ध्वभाग है, सम्यक्त्वरूप अक्ष/नेत्र हैं, सम्यग्ज्ञान रूप धुरा है । व्रत रूप भांड वस्तु/ महाव्रत रूप माल से भरी है, ऐसी दीक्षा गाडी पर चढकर प्रयाण/प्रस्थान करने वाले साधुरूप वणिक और निरन्तर स्व-पर के हित करने में उद्यमी ऐसे आचार्य, वे ही हैं सार्थवाह/संघ के स्वामी, उनके द्वारा प्रशंसा को प्राप्त साधु समूह संसाररूप महावन से तिर जाते हैं - पार उतर जाते हैं । संसार-वन में इन्द्रियरूप चोर बसते हैं और कषायरूप सिंह, व्याघ्र, सर्पादि दुष्ट जीव बसते हैं, उनसे साधु समूह की शुभ भावना ही रक्षा करती है ।
सदासुखदासजी