विसयाडवीए मज्झे ओहीणो जो पमाद दोसेण ।
इंदियचोरा तो से चरित्तभंडं विलुंपंति॥1300॥
विषयरूप अटवी में जाता जो साधु प्रमाद वश हो ।
इन्द्रिय चोर चुरा लेते उसके चारितरूपी धन को॥1300॥
अन्वयार्थ : और जो साधु प्रमाद के दोष से विषयों में अपसरण/प्रवर्तन करता है, उस साधु रूप वणिक/व्यापारी का चारित्ररूप भांड/धन को इन्द्रियरूपी चोर लूट लेते हैं ।

  सदासुखदासजी