अहवा तल्लिच्छाइं कूराइं कसायसावदाइं तं ।
खज्जंति असंजमदाढाइं किले सादि दंसेहिं॥1301॥
अथवा क्रूर कषाय-पशु उस लोभी को खाना चाहें ।
संक्लेश दाँतों से तथा असंयमरूपी दाढ़ों से॥1301॥
अन्वयार्थ : अथवा विषयों की वांछा करने वालों की कषायरूप क्रूर, दुष्ट, तिर्यंच असंयमरूप दाढों और संक्लेशरूप दाँतों से भक्षण करते हैं ।

  सदासुखदासजी