ओसण्णसेवणाओ पडिसेवंतो असंजदो होइ ।
सिद्धिपहपच्छिदाओ ओहीणो साधुसत्थादो॥1302॥
अवसन्न क्रिया में लीन साधु वह संयम से हो जाता हीन ।
मोक्षमार्ग से दूर हुआ वह साधु संघ से होय विहीन॥1302॥
अन्वयार्थ : जो मुनि के व्रत धारण करके अयोग्य वस्तु का सेवन करता है, वह अयोग्य सेवन से असंयमी हो जाता है । पश्चात् निर्वाण के मार्ग में गमन करने वाले साधु समूह से अपसृत/निकल जाता है, इसलिए अवसन्न कहते हैं । अवसन्न संज्ञा मुनि की है, उसे मुनि संघ से बाह्य जानना ।

  सदासुखदासजी