इंदियकसायगुरुगत्तणेण सुहसील भाविदो समणो ।
करणालसो भवित्ता सेवदि ओसण्णसेवाओ॥1303॥
सुखशीली जो साधु हुआ इन्द्रिय लोलुप अरु तीव्र कषाय ।
हुआ आलसी भ्रष्ट साधु की क्रिया करे अवसन्न कहाय॥1303॥
अन्वयार्थ : जो साधु इन्द्रिय कषाय के बडप्पन से सुखिया-स्वभावी होकर तथा त्रयोदश प्रकार के चारित्र में आलसी होकर साधुपने से चलायमान होता है, वह अवसन्न है । ऐसा अवसन्न का स्वरूप कहा ।

  सदासुखदासजी